Thursday, September 20, 2018

थकना छोड दिया

अब थकना छोड दिया हमने,
जब चलना सीख लिया हमने।
कहते थे  घनघोर निशा  होगी,
अब आस प्रभात  चुना हमने।
जब  प्रलय विलापी सता रहा,
नवसृजन  हृदय  बुना  हमने।
पथभ्रष्ट  बने   कुछ   राहगीर,
पथ मान बढाया जब कुछने।
कुछ काल सदा ही गाल बनी,
अब काल कपाल चुना सबने।
जीवन  के  लक्ष्य  सदा  अद्भुत,
'अनिल' कहता चलना है सबने।
अरु कहता थकना नही  हमने।।
हां  थमना  नही  है अब सबने।।

~ अनिल कुमार बरनवाल
13.09.2018

Thursday, September 13, 2018

ए जिन्दगी तुझसे कल रात मुलाकात हो गई

ए जिन्दगी तुझसे कल रात मुलाकात हो गई
तुमनें जो दर्द दिया था उसी पे बात हो गई।
वफा मे मेरे क्या एहसास कम रहे?
एहसास थे या नहीं उसी पे
बात हो गई।
हर नजम गले से हमीं ने लगाया,
वो नजम थी नही कि उसी पे बात हो गई।
वो वक्त क्या रहा जब सिला ही नहीं मिला?
'अनिल' वक्त बेवक्त पर यूं ही बात हो गई।

~ अनिल कुमार बरनवाल
13.09.2018

एक पल ठहरा नहीं

एक पल ठहरा नहीं,
कि दिल मेरा थकने लगा।
रूह को महसूस करके,
सांस अब चलने लगा।
कल्पना आलेख लेकर,
आज ऐ तनहाइयां,
कब सबल एक साथ पाईं,
दिल मेरा हिलने लगा।
हर सफर के साथ का सुख,
सफर के अन्दाज का सुख,
हमसफर का बोध लेकर,
मन मयूरी आस लेकर
आज अब विश्वास लेकर,
दिल का सिला मिलने लगा,
'अनिल' सांस हर चलने लगा।

~ अनिल कुमार बरनवाल
12.09.2018

आज अश्को में नहा लीजिए

आज अश्को में नहा लीजिए,
कल सुबह होगी तो कुछ बात होगी।
दर्द दिल का कुछ तो बता दीजिये,
गम निपट जाए तो कुछ बात होगी।
लोग बेवजह नशा ढूंढते है शराब में,
मस्त आंखो में पिया कीजिए तो कुछ बात होगी।
मय्यते जहान में क्यूं घुटा करते हैं,
जिन्दा जहान में निपट लें तो कुछ बात होगी।
आप रोएं रूला न ले औरों को,
रोनी सूरत को हंसा दे तो कुछ बात होगी।
कल बिछडेंगे आज तो मिल बैठें,
आज के सुख मे कल का शोक भूला दें तो कुछ बात होगी।

~ अनिल कुमार बरनवाल
12.09.2018

जीवन

आज मिले कल बिछड जाएगें।
जीवन - फलसफा कंहा पाएंगे?
मौत भी एक इम्तिहान है यारों।
जिन्दगी भर कहाँ समझ पाएंगे?

~ अनिल कुमार बरनवाल
03.09.2018

मन

मन पावत है।
मन चाहत है।
मन कभी कभी,
समझावत है।
मन हरबोले,
को गावत है।
मन को कोई,
यूं ही भावत है।
मन की पीडा,
को कभी कभी,
मन के भाषा,
से छावत है।
मन हार गये,
मन जावक है।
मन जीत गये,
भरमावत है।
मन के हैं,
रुप कई दर्पण,
मन भाषा मे,
ही बुझावत है।
मन कहे 'अनिल',
मनःस्थिति,
मन को ही,
आंख दिखावत है।

~ अनिल कुमार बरनवाल
06.08.2018

आओ अब हम बोध पाएं

आओ अब हम बोध पाएं,
प्रेम का अनुरोध पाएं,
प्रेम में न छल पिपासा,
कुछ कहें और कुछ दिलासा,
अब दिली कुछ शोध लाएं।
आओ अब हम बोध पाएं।।

भावना का है अंधेरा,
रोज खोजें हम सबेरा,
सुवह की लाली छटा है,
वक्त अब कैसे कटा है?
इस सुबह जीवन सजाएं।
आओ अब हम बोध पाएं।।

हरित बृक्षों की कमी है,
गगनचुंबी हो खडी हैं,
नव सृजन की आपधापी,
लहू लूहाती धरा व्यापी,
बसुधा मस्तक हम सजाएं।
आओ अब हम बोध पाएं।।

शिक्षितों की यह भूलैया,
कौन खेवे यह खैवैया,
रोजगारी एक मिथक है,
शिक्षा व्यापारी जनक है,
'अनिल' शिक्षित हो कमाएं।
आओ अब हम बोध पाएं।।


~ अनिल कुमार बरनवाल
24.07.2018