Sunday, January 13, 2019

मां

मां का है कोई मोल नही,
मां ममता है हरबोल रही।
मां हरदम है अनमोल सही,
मां निस्वार्थी है कोई तोल नहीं।

मां रोती जब बचपन रोता,
मां हंसती जब बचपन हंसता।
मां किलकारी में जीवन संजता,
मां जंचती जब बचपन जंचता।

मां नौ मासों के कोखों वाली,
मां बगिया की अविरल माली।
मां वात्सल्य की सुमधुर थाली,
मां बच्चों के चेहरों की है लाली।

मां सेतुबंधन करने वाली,
मां त्याग मूर्ति त्यागन वाली।
मां सबको लेकर चलने वाली,
मां कहता 'अनिल' मधुरिम वाली।

~ अनिल कुमार बरनवाल,
12.01.2019

Thursday, September 20, 2018

खुल के सदा ही प्यार करो

कभी उसको नजरअंदाज न करो,
जो आपकी परवाह करता है।
कभी दिल मे मलाल न करो,
क्योंकि दिल शर्मसार भी रहता है।
मिलो तो खुलकर मिलो,
क्योंकि तभी मिलने का इन्तज़ार रहता है।
कहतें है जिन्दगी चार दिन की,
दो दिन गुबार में निकाल दिए,
तो बचता क्या है?
इसलिए जिओ तो खुलके जिओ,
खुलने में लगता क्या है,
आज है,कल का क्या?
परसो कौन देगा भरोसा?
वक्त बेवक्त कुछ तो ख्याल करो।
अपने जीवन से,
गर आऐ हो इस दुनिया में,
बेइन्तहां,
खुल के सदा ही प्यार करो।
खुल के सदा ही प्यार करो।

~ अनिल कुमार बरनवाल
20.09.2018

जो हंसे न लहलहाके

जो हंसे न लहलहाके,
वो फसल फसल नहीं।
जो शरण न दे किसी को,
वह महल महल नहीं।
जो चढे न देवता को,
वो कमल कमल नहीं।
जो हरे न पीर मन की,
वो गज़ल गज़ल नहीं।

~ अनिल कुमार बरनवाल
20.09.2018

हमसफर जब साथ होगा, हर सफर कट जाएगा

आग सीने मे लगी हो,
धुआं न बन पाएगा।
प्यार की हर किश्तीयों में,
साहिल नजर आ जाएगा।
हमसफर .................. । (1)

रहा गर्दिश सफर कोई,
गर्दिशे हवा मे उड जाएगा।
शरद कैसा बरसात कैसी?
ग्रीष्म उडता जाएगा।
हमसफर….................। (2)

खुश रहेगा दिल सदा ही,
आबाद करता जाएगा।
नशा हर पल नजर का हो,
दिल जिगर शोखी पाएगा।
हमसफर............….....। (3)

जवां दिल हो या बुढापा,
बोझ ना बन पाएगा।
'अनिल' कहता हर गली मे,
मस्त मौला गाएगा।
हमसफर.....................।  (4)

~ अनिल कुमार बरनवाल
17.09.2018

बस प्रेम का ही गीत गाऊं

जी लिया हूँ जी गया हूँ,
जीते जीते मर न जाऊं।
आज जीने की तपिस में,
ऐसा कुछ मैं करता जाऊं।
रात  की  गहरी तमस मे,
आस का दीपक जलाऊ।
निशब्द होते इस गगन में,
अमन का एक गीत गाऊं।
हर कली बन फूल महके,
फूल  का  गजरा बनाऊं।
चमन महके सुमन महके,
महक से ना  बहक पाऊं।
अब धर्म जोडे जाति जोडे,
इस जुडन मे लिपट जाऊं।
आज कहता है 'अनिल' यूं,
मनस मानव बन सजाऊं।
छल प्रपंची व दुष्कपट में,
बस प्रेम का ही गीत गाऊं।

~ अनिल कुमार बरनवाल
14.09.2018

थकना छोड दिया

अब थकना छोड दिया हमने,
जब चलना सीख लिया हमने।
कहते थे  घनघोर निशा  होगी,
अब आस प्रभात  चुना हमने।
जब  प्रलय विलापी सता रहा,
नवसृजन  हृदय  बुना  हमने।
पथभ्रष्ट  बने   कुछ   राहगीर,
पथ मान बढाया जब कुछने।
कुछ काल सदा ही गाल बनी,
अब काल कपाल चुना सबने।
जीवन  के  लक्ष्य  सदा  अद्भुत,
'अनिल' कहता चलना है सबने।
अरु कहता थकना नही  हमने।।
हां  थमना  नही  है अब सबने।।

~ अनिल कुमार बरनवाल
13.09.2018

Thursday, September 13, 2018

ए जिन्दगी तुझसे कल रात मुलाकात हो गई

ए जिन्दगी तुझसे कल रात मुलाकात हो गई
तुमनें जो दर्द दिया था उसी पे बात हो गई।
वफा मे मेरे क्या एहसास कम रहे?
एहसास थे या नहीं उसी पे
बात हो गई।
हर नजम गले से हमीं ने लगाया,
वो नजम थी नही कि उसी पे बात हो गई।
वो वक्त क्या रहा जब सिला ही नहीं मिला?
'अनिल' वक्त बेवक्त पर यूं ही बात हो गई।

~ अनिल कुमार बरनवाल
13.09.2018